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माना जाता है कि भगवान श्रीराम ने श्रीलंका से लौटते समय देवों के देव महादेव (Lord Shiva) की इसी स्थान पर पूजा की थी। इन्हीं के नाम पर रामेश्वर मंदिर और रामेश्वर द्वीप का नाम पड़ा। ऐसी मान्यता है कि रावण का वध करने के बाद भगवान राम अपनी पत्नी देवी सीता के साथ रामेश्वरम के तट पर कदम रखकर ही भारत लौटे थी। एक ब्राह्मण को मारने के दोष को खत्म करने के लिए भगवान राम शिव की पूजा करना चाहते थे। चूंकि द्वीप में कोई मंदिर नहीं था, इसलिए भगवान शिव की मूर्ति लाने के लिए श्री हनुमान को कैलाश पर्वत भेजा गया था। जब हनुमान समय पर शिवलिंग लेकर नहीं पहुंचे तब देवी सीता ने समुद्र की रेत को मुट्ठी में बांधकर शिवलिंग बनाया और भगवान राम ने उसी शिवलिंग की पूजा की।बाद में हनुमान द्वारा लाए गए शिवलिंग को भी वहीं स्थापित कर दिया गया।

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अरुल्मिगु रामानाथास्वमी मंदिर

यह मंदिर के अंदर दो लिंग हैं। पहला मुख्य देवता रामलिंगम है और उसे सीता ने बनवाया था। दूसरा विश्वलिंगम जो कैलाश से हनुमान द्वारा लाया गया था। उसके साथ मंदिर परिसर में बाईस तीर्थ या पवित्र जल निकाय स्थित हैं।

विश्व का सबसे लंबा गलियारा तमिलनाडु के रामेश्वरम मंदिर में ही देखा जा सकता है।
इस मंदिर की बड़ी गलियारा की लंबाई 3850 फिट है,

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